वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर दुनिया भर में हलचल मच गई है। अमेरिकी डेल्टा फोर्स द्वारा राजधानी काराकास में किए गए कथित सैन्य अभियान ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व ने न सिर्फ वेनेजुएला की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अमेरिका और मादुरो शासन के बीच किसी गुप्त समझौते की अटकलों को भी हवा दी है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार तड़के अमेरिकी कमांडो हेलीकॉप्टरों के ज़रिये मादुरो के सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचे। बेहद कम समय में कार्रवाई को अंजाम देते हुए उन्हें बिना किसी बड़े सैन्य टकराव के अपने साथ ले जाया गया। इस पूरे ऑपरेशन में केवल एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर को मामूली नुकसान पहुंचा और कुछ जवानों के घायल होने की सूचना है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि वेनेजुएला की सेना की ओर से लगभग कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं देखा गया। जबकि सैन्य जानकारों का कहना है कि कम ऊंचाई पर उड़ रहे हेलीकॉप्टरों को साधारण हथियारों या कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों से भी निशाना बनाया जा सकता था।
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के यूएस स्टडीज़ प्रोग्राम के प्रमुख ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अनिल रमन के अनुसार, “इतने हाई-प्रोफाइल टारगेट के बावजूद सेना की निष्क्रियता असामान्य है। यह या तो आंतरिक विफलता है या फिर सत्ता के भीतर किसी तरह की सहमति का संकेत।”
इसी आधार पर रक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि मादुरो शासन के कुछ शीर्ष अधिकारियों और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के बीच सीक्रेट डील हुई हो सकती है, जिसने इस ऑपरेशन को लगभग बिना बाधा के सफल बना दिया।
फिलहाल मादुरो को कड़ी सुरक्षा में मैनहट्टन की अदालत में पेश किया जा चुका है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—
अगर यह हमला था, तो वेनेजुएला की सेना खामोश क्यों रही?
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