नई दिल्ली। आम धारणा है कि बैंक केवल लोन पर मिलने वाले ब्याज से कमाते हैं। होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन पर वसूला गया ब्याज निश्चित रूप से उनकी आय का अहम हिस्सा होता है, लेकिन बैंकों की कमाई का दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक है। आज बैंक ‘नॉन-इंटरेस्ट इनकम’ यानी ब्याज के अलावा मिलने वाली आय पर भी काफी हद तक निर्भर हैं। यही वजह है कि ब्याज दरों में कमी या रेपो रेट घटने के बावजूद बैंक मुनाफा दर्ज करने में सक्षम रहते हैं।
देश के प्रमुख बैंक जैसे State Bank of India, HDFC Bank और ICICI Bank की आय संरचना पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि उनका बिजनेस मॉडल बहुआयामी हो चुका है।
लोन पर लिया गया ब्याज अब भी बैंकों की आय का बड़ा स्रोत है। खुदरा, कॉरपोरेट और एमएसएमई सेक्टर को दिए गए कर्ज पर मिलने वाला ब्याज बैंकिंग राजस्व की बुनियाद बनाता है।
किसी भी लोन की मंजूरी के समय बैंक प्रोसेसिंग फीस लेते हैं। इसके अतिरिक्त समय से पहले लोन चुकाने पर प्रीपेमेंट या फोरक्लोजर शुल्क भी लगाया जाता है। ये शुल्क एकमुश्त होते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर बैंक के लिए उल्लेखनीय आय का स्रोत बनते हैं।
बैंक खातों से जुड़े विभिन्न शुल्क—न्यूनतम बैलेंस न रखने पर पेनल्टी, एटीएम से निर्धारित सीमा से अधिक निकासी पर चार्ज, डेबिट/क्रेडिट कार्ड की वार्षिक फीस, चेकबुक शुल्क और एसएमएस अलर्ट फीस—मिलकर स्थिर राजस्व प्रदान करते हैं।
डिजिटल बैंकिंग के विस्तार ने बैंकों को नया आय स्रोत दिया है। ऑनलाइन ट्रांजैक्शन, कार्ड पेमेंट, पीओएस मशीन और पेमेंट गेटवे के माध्यम से बैंक कमीशन अर्जित करते हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ यह आय निरंतर बढ़ रही है।
बैंक जमा राशि को केवल कर्ज देने में ही नहीं लगाते, बल्कि सरकारी बॉन्ड, ट्रेजरी बिल और अन्य सुरक्षित निवेश साधनों में भी निवेश करते हैं। ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से इन निवेशों के मूल्य में परिवर्तन होता है, जिससे ट्रेडिंग लाभ संभव होता है।
बैंक ‘बैंकएश्योरेंस’ मॉडल के तहत बीमा पॉलिसी और म्यूचुअल फंड बेचते हैं। उदाहरण के तौर पर Life Insurance Corporation of India जैसी बीमा कंपनियों के उत्पादों के वितरण पर बैंकों को कमीशन प्राप्त होता है।

No comments:
Post a Comment
Note: Only a member of this blog may post a comment.