Unlock 1.0 में ये होंगे ड्राइविंग के नियम, इन तीन राज्यों में भूल कर भी न करें ये गलतियां

आज की दिल्ली / इंडियन न्यूज़ ऑनलाइन :



लॉकडाउन 5.0 या Unlock 1.0 आप इसे चाहे कुछ भी कहना पसंद करें, लॉकडाउन के पिछले चरण की तुलना में इसमें कई सहूलियतें दी जा रही हैं। इसमें एक  राज्य से दूसरे राज्य में यात्रा भी की जा सकेगी।
हालांकि ज्यादातर मामलों में इसे अब सभी के लिए खोल दिया गया है, कुछ क्षेत्रों में अभी भी कुछ प्रतिबंध बरकरार हैं, खासकर दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में जहां पिछले कुछ समय से Covid-19 संक्रमण के पॉजिटिव मामले बढ़ रहे हैं।


दिल्ली और नोएडा के बीच ड्राइविंग:
गौतम बुद्ध नगर प्रशासन के अनुसार, यातायात के लिए अंतर-राज्यीय सीमाएं खोलने के लिए केंद्र की मंजूरी के बावजूद, नोएडा-दिल्ली की सीमा राष्ट्रीय राजधानी से लोगों के आने-जाने के लिए बंद रहेगी। रविवार को, नोएडा जिला प्रशासन ने लॉकडाउन 5.0 के लिए दिशा-निर्देश जारी किए और कहा कि यह फैसला उन रिपोर्टों के आधार पर लिया गया है कि पिछले 20 दिनों में जिले में पाए गए 42 फीसदी कोरोना वायरस मामलों को दिल्ली में ट्रैक किया गया है। 
बयान में कहा गया है, "इसलिए, सार्वजनिक हित में यह फैसला लिया गया है कि राज्य की सीमा के संबंध में यथास्थिति बरकरार रखी जाएगी।"

आवश्यक सेवाओं और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी पास के अलावा, दिल्ली-नोएडा सीमा 21 अप्रैल से सील है।

हालांकि, अच्छी खबर यह है कि आवश्यक सेवाओं में लोगों को अब सीमाओं के बीच जाने के लिए पास की आवश्यकता नहीं होगी। 
इससे पहले रविवार को, उत्तर प्रदेश सरकार ने अंतरराज्यीय यात्रा की अनुमति दी, लेकिन नई दिल्ली से सटे लोगों की आवाजाही पर फैसला लेने का अधिकार गाजियाबाद और नोएडा के जिला प्रशासन पर छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आरके तिवारी ने पीटीआई से कहा, "व्यक्तियों या वस्तुओं की राज्य के अंदर और राज्य के बाहर आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं है।"

लेकिन इसके साथ ही, आदेश में कहा गया है कि दिल्ली के कंटेनमेंट क्षेत्रों से एनसीआर क्षेत्र के गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध रहेगा।

यदि आपका घर प्राधिकरण द्वारा चिन्हित किसी भी कंटेनमेंट जोन के अंतर्गत आता है, तो सभी गैर-आवश्यक आवाजाही पर प्रतिबंधित बरकरार रहेगा। 

दिल्ली और गुरुग्राम के बीच ड्राइविंग:
लॉकडाउन 4.0 के ज्यादातर समय में नियमित यातायात की आवाजाही के लिए दिल्ली और गुरुग्राम के बीच की सीमा को भी सील कर दिया गया था। वाहनों की अंतर-राज्यीय आवाजाही को फिर से खोलने के लिए केंद्र सरकार की सलाह के बाद, राज्य सरकार ने तीन-चरण में लॉकडाउन से बाहर निकलने के दिशानिर्देश जारी किए हैं।

लॉकडाउन 5.0 के पहले चरण के लिए जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, राज्य परिवहन विभाग अंतरराज्यीय और अंतर-जिला बस मार्गों की समय सारणी जारी करेगा, जिन्हें समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है।

अंतरराज्यीय आवाजाही की अनुमति से गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों से दिल्ली में काम के लिए रोजाना सफर करने वाले यात्रियों को बड़ी राहत मिलने की संभावना है। 

लॉकडाउन 5.0 के दौरान यात्रा करने के लिए दिशानिर्देश
निजी वाहनों और सार्वजनिक परिवहन के लिए नियम पिछले लॉकडाउन चरण के जैसे ही रहेंगे। जिसका मतलब है, चालक के अलावा दो से ज्यादा लोग एक वाहन के अंदर यात्रा नहीं कर सकेंगे। दोपहिया वाहनों के लिए भी, लॉकडाउन के पिछले चरण में जारी किए गए दिशानिर्देश जारी रहेंगे। किसी को भी अपने वाहन को बाहर ले जाने के लिए फेस मास्क लगाना अनिवार्य होगा। 

बाहर निकलने के समय में लॉकडाउन 4.0 की तुलना में बदलाव आया है। शाम 7 से सुबह 7 बजे के कर्फ्यू की जगह अब लोग सुबह 5 बजे घर से निकल सकेंगे। अब कर्फ्यू रात 9 बजे लगाया जाएगा, जिससे यात्रियों को घर लौटने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। 

Samsung Galaxy A51 का नया 8 जीबी रैम वेरिएंट भारत में लॉन्च, जानें कीमत

एस्ट्रो धर्म :



Samsung Galaxy A51 का 8 जीबी रैम और 128 जीबी इंटरनल स्टोरेज वेरिएंट बुधवार को भारत में लॉन्च कर दिया गया है। कंपनी ने इससे पहले इस गैलेक्सी ए51 स्मार्टफोन को केवल 6 जीबी रैम वेरिएंट के साथ लॉन्च किया था और अब ग्राहकों के पास इसे 8 जीबी रैम के साथ खरीदने का विकल्प भी उपलब्ध है। याद दिला दें कि मौजूदा सैमसंग गैलेक्सी ए51 6 जीबी रैम वेरिएंट की भारत में कीमत 23,999 रुपये है। Galaxy A51 की मुख्य खासियत इन्फिनिटी-ओ डिस्प्ले, क्वाड रियर कैमरा सेटअप है। इसके अलावा गैलेक्सी ए51 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर काम करने वाला गेम बूस्टर भी शामिल है, जो मोबाइल गेमर्स के लिए फोन की परफॉर्मेंस को बढ़ाने का काम करता है।

Samsung Galaxy A51 8GB RAM variant price in India, availability

सैमसंग गैलेक्सी ए51 के नए 8 जीबी रैम + 128 जीबी स्टोरेज वेरिएंट की भारत में कीमत 27,999 रुपये है। फोन पहले से ही प्रिज़्म क्रश ब्लैक, प्रिज़्म क्रश ब्लू, और प्रिज़्म क्रश व्हाइट कलर विकल्पों में आता है। मौजूदा Samsung Galaxy A51 वेरिएंट के साथ नया वेरिएंट भी देश के सभी ऑफलाइन रिटेल स्टोर, लीडिंग ई-कॉमर्स पोर्टल और सैमसंग इंडिया ई-स्टोर के जरिए बिक्री के लिए उपलब्ध हो चुका है।

Samsung Galaxy A51 specifications

डुअल सिम सैमसंग गैलेक्सी ए51 एंड्रॉयड 10 पर आधारित One UI 2.0 पर चलेगा। इसमें 6.5 इंच का फुल-एचडी+ (1080x2400 पिक्सल) सुपर एमोलेड इनफिनिटी-ओ डिस्प्ले है। फोन में ऑक्टा-कोर एक्सीनॉस 9611 प्रोसेसर के साथ 6 जीबी और 8 जीबी रैम विकल्प मौजूद हैं। Samsung के इस फोन के दोनों वेरिएंट की इनबिल्ट स्टोरेज 128 जीबी है। ज़रूरत पड़ने पर 512 जीबी तक का माइक्रोएसडी कार्ड इस्तेमाल करना संभव होगा।

पिछले हिस्से पर क्वाड कैमरा सेटअप है। प्राइमरी सेंसर 48 मेगापिक्सल का है। यह एफ/ 2.0 लेंस के साथ आएगा। इसके साथ एफ/ 2.0 अपर्चर वाला 12 मेगापिक्सल का सेकेंडरी कैमरा दिया गया है। 5 मेगापिक्सल का मैक्रो कैमरा और 5 मेगापिक्सल का डेप्थ सेंसर भी इस कैमरा सेटअप का हिस्सा हैं। सेल्फी के लिए सैमसंग गैलेक्सी ए51 में 32 मेगापिक्सल का सेंसर है। इसका अपर्चर एफ/ 2.2 है।
कनेक्टिविटी फीचर्स में 4जी एलटीई, वाई-फाई, ब्लूटूथ, जीपीएस/ ए-जीपीएस और यूएसबी टाइप-सी पोर्ट शामिल हैं। स्मार्टफोन इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर से लैंस है। यह 4,000 एमएएच की बैटरी के साथ आता है और 15 वॉट की फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करता है।

चौथी क्रांति का तिलिस्‍म, 5G का जाल, चीन का सपना चकनाचूर

आज की दिल्ली /  इंडियन न्यूज़ ऑनलाइन :



एक ऐसे युग में जिसे चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए जाना जाएगा, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा और इंटरनेट ऑफ थिंग्स की बड़ी भूमिका की उम्मीद की जा रही है, वहां 5G टेक्नोलॉजी से ज्यादा फायदा लेना ये तय कर सकता है कि आगामी महाशक्ति बनने की लड़ाई में कौन जीतेगा. हालांकि, मौजूदा दौर में कोरोना वायरस महामारी के दौरान भू-राजनीतिक घटनाक्रम होने से चीन की भारी भरकम ग्लोबल 5G स्ट्रैटजी या तो कमजोर पड़ सकती है या फिर टल सकती है, जो कि बीजिंग के डिजिटल सिल्क रोड प्लान के लिए भी काफी अहम है.
कोरोना वायरस के आने से पहले चीन की योजनाओं के खिलाफ अमेरिका की अगुवाई में खड़ा होने वाला देशों का छोटा समूह अब और देशों के शामिल होने से बड़ा हो सकता है क्योंकि मौजूदा महामारी के दौरान जवाबदेही, जिम्मेदारी और प्रोपगेंडा पर चीन के व्यवहार से इन देशों का बीजिंग पर विश्वास उठ गया है. 
भू-राजनीतिक लड़ाई
आधुनिक इतिहास में तकनीकी वर्चस्व हासिल करना भू-राजनीतिक लड़ाई का प्रमुख हिस्सा रहा है, और यही बात अमेरिका-चीन के बीच जारी मुकाबले के लिए भी है. इस बात की अहमयित समझते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने पिछले कुछ वर्षों से चीन के प्रमुख 5G प्लेयर हुआवेई (Huawei) और दूसरे प्लेयर ZTE के खिलाफ ग्लोबल कैंपेन छेड़ दिया है. उन्होंने आरोप लगाए हैं कि चीन ने 5G टेक्नोलॉजी से जुड़ी इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी की चोरी की है और साथ ही ट्रंप ने इसके जरिए जासूसी से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा होने का मुद्दा भी उठाया.
इसका नतीजा ये हुआ कि ट्रंप प्रशासन ने हुआवेई के खिलाफ कई कदम उठाने की घोषणा कर दी. जिसमें खासतौर पर अमेरिका और उससे आगे सस्ती दरों पर 5G उपकरण मुहैया कराने की हुआवेई की क्षमता को कम करने की कोशिश की गई. महामारी के दौरान सबसे ताजा पाबंदी ये लगाई गई कि हुआवेई विदेशों में अपने सेमीकंडक्टर बनाने के लिए अमेरिकी टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं करेगा. अमेरिका ने हुआवेई पर एक्सपोर्ट कंट्रोल के उपायों को कमजोर करने का आरोप लगाया है
महामारी के दौरान बढ़ रही चीन विरोधी भावना
अमेरिकी सरकार ने महामारी के दौरान बढ़ रही चीन विरोधी भावनाओं का फायदा उठाते हुए नई पाबंदियां लगाई हैं. अमेरिका की लगाई नई पाबंदी से हुआवेई का R&D वर्क प्रभावित होगा. इसकी बिजनेस कॉस्ट भी बढ़ जाएगी क्योंकि चिप बनाने वाली कंपनियां चीन की हुआवेई को चिप सप्लाई नहीं कर सकतीं अगर वो अमेरिकी टेक्नोलॉजी पर बनी हों. इसके अलावा, वर्तमान में इस टेक्नोलॉजी का चीन में विकल्प भी नहीं है. इस पाबंदी से हुआवेई को यूरोपियन यूनियन समेत दुनियाभर में कंपोनेंट्स सप्लाई करने वाली कंपनियां भी प्रभावित होंगी, जिससे हुआवेई की इंटरनेशनल सेल्स को भारी नुकसान होगा. इस कार्रवाई के बाद चीन इस कदर तिलमिला गया है कि उसने आगे और ऐसे कदम उठाए जाने पर चीन में बड़े पैमाने पर कारोबार कर रही अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ बदले की नीयत से कार्रवाई करने की धमकी दी है.
एक तरफ ट्रंप प्रशासन अपने देश में हुआवेई के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रहा है साथ ही दुनियाभर में अपने साथी देशों को हुआवेई पर बैन लगाने के लिए राजी कर रहा है ताकि चीन की कंपनी उनके टेलीकम्युनिकेश नेटवर्क तक पहुंच ना बना सके. जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे कुछ साथी देशों ने अमेरिका के हुआवेई पर पाबंदी लगाने की योजनाओं का समर्थन किया है, तो वहीं कनाडा और यूरोपियन यूनियन महामारी से पहले इस मुद्दे पर चर्चा ही कर रहे थे. यूरोपियन यूनियन के कई सदस्य देश इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं क्योंकि चीन का इनमें से कई देशों में काफी प्रभाव है.
इसके अलावा, महामारी से पहले अमेरिका को यूनाइटेड किंगडम से निराशा हुई जिसने संकोच करते हुए कुछ महीने पहले हुआवेई को अपने नेटवर्क के लिए सीमित पहुंच दे दी. फिर भी, चूंकि वायरस की उत्पत्ति के प्रति जवाबदेही, सप्लाई चेन निर्भरता को लेकर भरोसा और ग्लोबल मीडिया में तूफानी हमलों के जरिए प्रॉपगेंडा को लेकर चीन पर सवाल उठ रहे हैं, जिसके बाद यूके में चीन विरोधी लॉबी इस मौके को भांपते हुए बोरिस जॉनसन प्रशासन को ये समझाने में जुट गई है कि हुआवेई पर कार्रवाई की जाए जैसा कि ब्रिटिश मीडिया का सुझाव है. पिछले सप्ताह द फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया कि यूके सरकार अगले तीन साल में ब्रिटेन के 5G नेटवर्क से हुआवेई को पूरी तरह से बाहर निकालने की योजना बना रही है. पिछले कुछ महीनों में ही हुआवेई को लेकर यूके की सोच में बहुत बड़ा बदलाव आया है. 
जनवरी 2020 के आखिरी सप्ताह में, यूरोपियन कमीशन ने किसी भी भारी जोखिम वाले 5G सप्लायर पर पूरी तरह बैन लगाने के बजाय कड़े नियमों की सिफारिश की थी, जिसमें अहम और संवेदनशील संपत्ति को बाहर रखने और अलग-अलग वेंडरों के सुनिश्चित करने की रणनीति शामिल थी. इसी तरह, फरवरी 2020 में जर्मनी की सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों ने 5G नेटवर्क में विदेशी वेंडरों की सीमित हिस्सेदारी की मांग वाले प्रस्ताव का समर्थन किया क्योंकि क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) में एक चीन विरोधी समूह मर्केल प्रशासन पर हुआवेई के खिलाफ पूरी तरह से पाबंदी लगाने का दबाव बना रहा है.
इसके अलावा, CDU गठबंधन में शामिल सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी सप्लायर कंपनियों के देशों के गवर्निंग सिस्टम को देखते हुए उनकी राजनीतिक विश्ववसनीयता पर सवाल उठा रही है. ऐसे में जब जर्मनी की संसद में 5G नेटवर्क सप्लायर से अतिरिक्त जानकारी मांगने वाला ड्राफ्ट बिल पेश किया जाएगा तो हुआवेई जैसी कंपनियों को झटका लगना तय है. हैंडेल्सब्लाट (Handelsblatt) की रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू राजनीतिक तरजीह और अमेरिकी कार्रवाई के बाद कारोबार की बढ़ती लागत को देखते हुए डॉइच टेलीकॉम (Deutsch Telekom) और वोडाफोन पहले से ही अपने नेटवर्क के संवेदनशील हिस्से से हुआवेई के उपकरणों को हटाने पर विचार कर रहे हैं. 
हालांकि ये सुझाव एकदम प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं करते, जैसा कि अमेरिका चाहता है, फिर भी वे हुआवेई जैसे विदेशी वेंडरों के खिलाफ काफी कठोर नियंत्रण व्यवस्था के पक्ष में हैं. यही नहीं, इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर फ्रांस-जर्मनी के नए कोविड-19 प्लान के तहत औद्योगिक रणनीति के तौर पर यूरोपियन यूनियन के सदस्य देश विदेशी कंपनियों के मुकाबले नोकिया और एरिक्सन जैसे लोकल EU 5G प्लेयर को तरजीह दें. फ्रांस-जर्मनी के बीच करार "रणनीतिक क्षेत्रों में गैर-यूरोपीय संघ के निवेशकों की स्क्रीनिंग" को मजबूत करने और यूरोपियन कॉम्पिटिशन पॉलिसी में "सरकारी मदद और प्रतिस्पर्धा नियमों की अनुकूलता में तेजी लाने" पर जोर देता है.
इसके अलावा, एक तरह की नीतिगत प्राथमिकता में, यूरोपीय संघ के विदेश मामलों और सुरक्षा नीति के उच्च प्रतिनिधि जॉसेप बॉरेल फॉन्टेल्स ने कई मीडिया आउटलेट्स में प्रकाशित अपने लेख में सुझाव दिया कि राज्य-केंद्रित चीनी दृष्टिकोण यूरोपीय संघ के मल्टी-स्टेकहोल्डर अप्रोच के खिलाफ है जो कि साइबर डोमेन में मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए सम्मान पर आधारित है. इसके साथ ही उन्होंने रणनीतिक क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता से बचने की अपील की है. इन घटनाक्रम से साफ है कि OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के ज्यादातर देशों में हुआवेई की पहुंच पर पाबंदी रहने वाली है, जिससे चीन की राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही महत्वाकांक्षाएं सीमित रहेंगी.
हाई वैल्यू मार्केट में ASEAN एक ऐसा क्षेत्र है जहां वियतनाम को छोड़कर हुआवेई के लिए ज्यादा अच्छा माहौल मिलेगा. हालांकि वियतनाम ने हुआवेई पर बैन नहीं लगाया है, लेकिन ये दावा करता है कि इसने देश के रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करने वाली वियतनाम की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी वियतटेल के जरिए अपना 5G टेक विकसित कर लिया है, जिसको लेकर जानकार मानते हैं कि ये चीन के हुआवेई की उपेक्षा करने में मददगार साबित होगा. कंपनी ने दावा किया है कि उसकी फिलहाल हुआवेई के साथ काम करने की कोई योजना नहीं है. ये हालात ज्यादा बदलने वाले नहीं हैं क्योंकि चीन साउथ चाइना सी में आक्रामकता बढ़ाने में लगा है. इसके अलावा, ब्राजील और भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले प्रमुख देशों को भी अभी इस बारे में फैसला लेना बाकी है. 
भारत उन शुरुआती देशों में से एक था जिसने करीब एक दशक पहले ही हुआवेई के बारे में जासूसी से जुड़ी चिंता का मुद्दा उठाया था. भले ही सरकार ने हुआवेई को ट्रायल के लिए इजाजत दे दी है, लेकिन इस मुद्दे पर सरकार को अस्पष्टता का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि देश का रणनीतिक समुदाय राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को लेकर बेहद चिंतित हैं. भारत-चीन सीमा पर जारी टकराव और कड़े डेटा प्रोटेक्शन कानून को लाने की भारत सरकार की योजना से भी ये स्थिति और कठिन होने वाली है.
भारत की स्थिति
इसके अलावा, हाल ही में इंडिया में 5G को लेकर भी कुछ दिलचस्प घटनाक्रम हुए हैं. पहला, एयरटेल, जो कि हुआवेई की समर्थक है, जिसने हुआवेई को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच अपने 4G नेटवर्क को आधुनिक बनाने और इसका विस्तार करने के लिए नोकिया के साथ 1 बिलियन डॉलर की डील की है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में 5G नेटवर्क के लिए भी किया जाएगा. दूसरा, रिलायंस जियो, भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी, जिसने खुद का 5G टेक विकसित करने का दावा किया है. यही नहीं, जियो ने यह भी दावा किया है कि ये दुनिया की एकमात्र कंपनी है जो अपने 4G और 5G नेटवर्क में चीन के किसी भी उपकरण का इस्तेमाल नहीं करती और आगे भी इस बात पर कायम रहेगी. 
ये सभी घटनाक्रम बताते हैं कि दुनियाभर में चीन की 5G योजनाओं के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि इसे अमेरिकी नेतृत्व में चल रहे अभियान का सामना करना पड़ रहा है. जब महामारी के दौरान भू-राजनीति की तस्वीर साफ हो जाएगी, तब भी किसी को ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि हुआवेई के लिए हालात बेहतर हो जाएंगे, खासकर जब चीन ने ईस्ट चाइना सी, साउथ चाइना सी, ताइवान स्ट्रेट, हांग कांग और भारत-चीन सीमा में सैन्य आक्रामकता बढ़ा दी है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय, जिसमें खासकर चीन की आक्रामकता का शिकार देश शामिल हैं और पश्चिमी देश जो कि अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवाधिकारों की चिंता करते हैं, अपने रुख में जल्द नरमी नहीं लाएंगे अगर महामारी को लेकर झगड़ा जारी रहता है.

कोरोना वायरस : 2 साल तक करना पड़ सकता है सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन, जानें वजह

एस्ट्रो धर्म:



कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा कर रख दिया है। हर तरफ लोगों में भय व्याप्त है और लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। कोरोना वायरस से जूझ रही और सामाजिक दूरी का पालन कर रही दुनिया को आने वाले 2 साल तक यानी 2022 तक कई सख्त नियमों का पालन करना पड़ सकता है। इस संबंध में कई तरह के शोध अब सामने आ रहे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस के खिलाफ जंग का यह मात्र पहला चरण है। आने वाले समय में और भी कई विपत्तियां सामने आ सकती हैं। हालांकि, कई देशों में वायरस का प्रभाव कमजोर होते देखकर लॉकडाउन में कुछ ढील दे दी गई है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही कोरोना वायरस के संक्रमण को फिर बढ़ा सकती है और लाखों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं। डॉ. आयुष पाडे के अनुसार, बुजुर्गों, बच्चों और उन लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग ही इलाज है, जिनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम है।

हावर्ड यूनिवर्सिटी के शोध में खुलासा
हाल ही में अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का एक शोध साइंस जर्नल पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यूनिवर्सिटी के टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों को इस बात की गंभीर आशंका है कि लॉकडाउन में ढील के दौरान नियमों में थोड़ी भी लापरवाही की तो वायरस का प्रभाव कई इलाकों में फिर गंभीर रूप धारण कर सकता है और मानव समाज फिर एक बार गंभीर संकट का दौर देख सकता है।

यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में एक कंप्यूटर मॉडल के जरिए परखा कि जब तक सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन किया जाता है तो कोरोनावायरस का दोबारा संक्रमण रोका जा सकता है, उन्होंने अपने शोध में 2003 में फैले सार्स वायरस का भी इस संबंध में उदाहरण पेश किया।

6 माह सख्त सावधानी, 2 साल सोशल डिस्टेंसिंग का नियम जरूरी
वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस इंफ्लुएंजा के समान ही दुनियाभर में रहेगा। ऐसे में यह आशंका है कि आने वाले कम से कम 6 माह तक बहुत ज्यादा सावधानी बरतनी होगी, इसके अलावा उन्होंने अपने शोध में यह भी दावा किया है लॉकडाउन के नियमों का लोगों को कम से कम 2 साल तक पालन करना पड़ सकता है।

दो सप्ताह में दिखता है लॉकडाउन का परिणाम
लॉकडाउन की वजह से क्या कोरोना वायरस को रोकने में क्या सफलता मिली है, इसका आकलन करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कम से कम 2 हफ्ते का इंतजार करने के लिए कहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोरोना संक्रमण के नए केस नहीं आने पर ही लॉकडाउन के नियमों में थोड़ी बहुत ढील दी जानी चाहिए।

गाइडलाइन का पालन नहीं किया तो बढ़ेगा खतरा
हावर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक वैक्सीन नहीं बन जाती है, तब तक कोरोना संक्रमण से बचने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो गाइडलाइन तैयार की है, उसे कठोरता से पालन करना जरूरी है। एम्स के डॉ. अजय मोहन के अनुसार, वैक्सीन बनने में कम से कम 2 साल का समय लग सकता है तब तक हमें सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन करके जीवन जीना अनिवार्य करना होगा।

खुद में बदलाव करता है कोरोना वायरस
हावर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह भी खुलासा किया है कि कोरोना वायरस समय-समय पर खुद में बदलाव भी करता है, जो एक बेहद ही खतरनाक स्थिति है। ऐसे में वैक्सीन का निर्माण करना और भी ज्यादा जटिल हो सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि कोरोना संक्रमित किसी मरीज में लक्षण दिखाई देते हैं तो किसी मरीज में लक्षण बिल्कुल भी दिखाई नहीं देते हैं। ऐसे में खुद वैज्ञानिक भी अभी तक कोरोना वायरस को लेकर चल रहे शोध में संशय की स्थिति में हैं।

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बोले- हमारे श्रमिक भाई थोड़े अधीर हो गए थे

आज की दिल्ली / इंडियन न्यूज़ ऑनलाइन :

भारत के कृषि, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा है कि लॉकडाउन के दौरान पैदल ही या साइकिलों पर अपने घरों की ओर निकलने वाले श्रमिक भाई थोड़े अधीर हो गए थे.
नरेंद्र तोमर का मानना है कि प्रवासी मज़दूरों को कुछ इंतज़ार करना चाहिए था.
जब उनसे पूछा गया कि पहले चरण का लॉकडाउन घोषित करते वक़्त सरकार को प्रवासी संकट का अंदाज़ा हो जाना चाहिए था और क्या सरकार में इस पर चर्चा हुई है तो उन्होंने कहा, "सरकार को हमेशा से पता था और सरकार को पूरी जानकारी है कि बेहतर आर्थिक परिस्थितियों के लिए लोग एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े मे जाते हैं. ये स्वभाविक है कि जब लॉकडाउन की स्थिति होगी तो लोग असुरक्षित महसूस करेंगे और अपने घर जाना चाहेंगे. और ऐसा ही हुआ."
लेकिन क्या जिस तादाद में लोगों की मौत हुई और जितनी परेशानियां उन्हें उठानी पड़ी यह इस बात का सबूत नहीं है कि योजना बनाने और उसे लागू करने में कमियां रहीं?
बीबीसी ने जानकारी जुटाई है कि 26 मई 2020 तक घर जाने की कोशिश के दौरान कम से कम 224 प्रवासी श्रमिकों की मौत हुई है.

श्रमिक भाई थोड़े बेसब्र हो गए थे'

"मुश्किल वक़्त में सभी दिक्कतों का सामना करते हैं. लेकिन इसके बावजूद लोगों ने पूरा सहयोग किया. स्वास्थ्य से जुड़े और लॉकडाउन से जुड़े दिशानिर्देशों का पालन किया गया. दुर्भाग्यवश पैदल चलने या रेलवे ट्रेक पर चलने के दौरान लोगों की मौत हुई. लेकिन हमें ये भी देखना होगा कि हर व्यक्ति जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था. एक ही गंतव्य स्थान के लिए ट्रेन उपलब्ध थी लेकिन दस स्थानों को जाने वाले लोग इकट्ठा हो गए! ऐसे में जब तक अगली ट्रेन नहीं आएगी, लोगों को इंतेज़ार करना होगा. ऐसे में कहीं न कहीं हमारे श्रमिक भाई थोड़े अधीर हो गए थे और इसी वजह से बिना किसी का इंतेज़ार किए कुछ साइकिलों पर और कुछ पैदल ही निकल पड़े. मुश्किलें सबने उठाई हैं, उन लोगों ने भी जो अपने घरों में ही थे."
प्रवासियों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को लिखा था, "निश्चित तौर पर इतने बड़े संकट में कोई ये दावा नहीं कर सकता कि किसी को कोई तकलीफ या असुविधा न हुई हो. श्रमिक, प्रवासी मजदूर भाई-बहन, छोटे-छोटे उद्योगों में काम करने वाले कारीगर, पटरी पर सामान बेचने वाले आदि लोगों ने असीमित कष्ट सहा है. इनकी परेशानियों को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं."

राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन


28 मई को भारत के सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि अब तक एक करोड़ प्रवासियों को घर पहुंचा दिया गया है और जब तक सबको घर नहीं पहुंचा दिया जाएगा प्रयास नहीं रुकेंगे. बशर्ते वो घर जाना चाहें.
शीर्ष अदालत ने कहा है कि मज़दूरों के पंजीकरण, यातायात और उनके रहने खाने के इंतेजाम की प्रक्रिया में कई लापरवाहियां हुई हैं.
राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के कुछ दिन बाद से ही कई जगहों पर मज़दूरों और प्रवासी श्रमिकों की भीड़ इकट्ठा हुई थी. कई जगह पुलिस को भीड़ को खदेड़ना पड़ा और कई जगह तो लाठीचार्ज तक करना पड़ा.
प्रवासियों की भीड़ इकट्ठा होने की वजह सरकारी आदेश थे.

प्रवासियों का पलायन

उदाहरण के तौर पर 28 मार्च को समाचार एजेंसी पीटीआई ने ख़बर दी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने दिल्ली की सीमा पर एक हज़ार बसें मज़दूरों को लेने भेजी हैं. इस आदेश के बाद कई हज़ार लोग बस अड्डों पर इकट्ठा हो गए लेकिन उन्हें बसे नहीं मिल सकीं. इससे जुड़ी ख़बरें बीबीसी में भी प्रकाशित हुईं थीं.
ये तब हुआ था जब केंद्र सरकारें और राज्य सरकारें इस बात पर ज़ोर दे रहीं थीं कि श्रमिक जहां हैं वहीं रहें.
31 मार्च को केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 21064 राहत केंद्र बनाए गए हैं जिनमें छह लाख से अधिक मज़दूर रह रहे हैं और तेईस लाख मज़दूरों को खाना खिलाया गया है.
सरकार ने कहा कि प्रवासियों का जो पलायन हुआ था वो नियंत्रण में है.
जब नरेंद्र सिंह तोमर से पूछा गया कि सरकार ने मज़दूरों के खाते में सीधे पैसा क्यों नहीं भेजा गया और चरणबद्ध शटडाउन क्यों नहीं किया गया जिससे प्रवासियों का पलायन रुक सकता था तो उन्होंने कहा, 'ये उम्मीद रखना कि सरकार कुछ करेगी स्वभाविक ही है और केंद्र और राज्यों सरकारें उनके लिए जो कर सकती थीं किया गया है.'

तमाम दावों के बावजूद

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी के दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा होने पर मीडिया में दिए एक साक्षात्कार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दावा किया है कि केंद्र सरकार ने कैंपों में रह रहे मज़दूरों का ध्यान रखने के लिए राज्य सरकारों को 11 हज़ार करोड़ रुपये दिए हैं.
बीबीसी को ऐसे बहुत से मज़दूर मिले हैं जो सरकारों के तमाम दावों के बावजूद पैदल ही अपने घरों की ओर जा रहे थे. उनमें से अधिकतर ने हमें बताया है कि या तो उन्हें कम राशन मिल रहा था या कुछ भी नहीं मिल रहा था. उन्हें भोजन पाने के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा था. धूप में कई घंटे खड़े रहने के बाद एक वक्त का खाना मिल पा रहा था.
मज़दूरों का कहना था कि ऐसे मुश्किल वक़्त में वो अपने परिजनों के साथ रहना चाहते हैं.

दिल्ली की सीमाएं सील, इलाज के लिए आने वालों को क्यों रोका जा रहा?

आज की दिल्ली / इंडियन न्यूज़ ऑनलाइन :



दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने एक सप्ताह के लिए सीमा सील करने का आदेश दिया है। सीएम ने कहा कि दिल्ली में लोग अच्छे स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे गी हम सीमा खोलेंगे यहां कोरोना के लिए रखे गए बेड तुरंत भर जाएंगे। दिल्ली के सीएम के इस फैसले को सियासी नजरिए से भी देखा जा रहा है। बता दें कि बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने दिल्ली से लगती जिलों की सीमाओं को सील कर दिया है। दिल्ली सीएम के फैसले को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं, सोशल मीडिया पर केजरीवाल के फैसले पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि किसी को इलाज से कैसे रोका जा सकता है।
धवल पटेल नामक एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि दिल्ली एक अलग देश नहीं है और संघीय ढांचा में कोई भी शख्स एक राज्य से दूसरे राज्य कहीं भी आ-जा सकता है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में गौतमबुद्ध नगर जिले और गाजियाबाद जिले के जिलाधिकारियों ने दिल्ली से लगी सीमाओं को सील करने का आदेश दे रखा है। प्रशासन का कहना है कि 40 फीसदी से ज्यादा कोरोना के केस दिल्ली सीमा के खुले होने के कारण बढ़े हैं। वहीं, हरियाणा ने भी गुड़गांव से लगती सीमा को सील कर दिया था।

शुक्रवार तक सुझाव, एक सप्ताह के लिए सीमा सील
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री ने बॉर्डर खोलने पर आम जनता से राय मांगी है। उन्‍होंने कहा कि 'अगर बॉर्डर खोल दिए तो देश भर से लोग इलाज के लिए दिल्ली आते हैं। दो कारणों से आते हैं। एक तो दिल्ली की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं सबसे अच्‍छी हैं। दूसरा लोग इसलिए दिल्ली आते हैं कि यहां सबकुछ मुफ्त है। जैसे ही हम बॉर्डर खोलेंगे, देशभर से लोग दिल्ली में इलाज के लिए आएंगे। जो साढ़े 7 हजार बेड रखे गए हैं, ये दो दिन के अंदर भर जाएंगे। हमें क्या करना चाहिए? क्या बॉर्डर खोलने चाहिए? कुछ लोगों का कहना है कि बॉर्डर खोल देना चाहिए। कुछ लोगों का सुझाव है कि कोरोना काल तक दिल्ली में सिर्फ दिल्ली के मरीजों का इलाज हो। क्‍या किया जाना चाहिए, आपका सुझाव चाहिए।' उन्होंने दिल्ली की जनता से शुक्रवार शाम 5 बजे तक सुझाव मांगा है।

लद्दाख में सैन्य अड्डों पर चीन के बाद भारत ने भी तैनात की तोपें और बड़े युद्धक वाहन

आज की दिल्ली / इंडियन न्यूज़ ऑनलाइन :




भारत और चीन की सेनाएं तोपों और टैंकों समेत भारी हथियारों और युद्धक उपकरणों का पूर्वी लद्दाख के विवादित क्षेत्र के नजदीक स्थित सैन्य अड्डों पर जमावड़ा कर रही हैं। दोनों देशों में पिछले 25 दिनों से जारी तनातनी के बीच जमा किए जा रहे हथियारों से लद्दाख के युद्ध का मैदान बनने की आशंका बढ़ती जा रही है।


चीनी सेना ने वहां पर बड़ी तादाद में पैदल सेना को ले जाने वाले युद्धक वाहनों को भी तैनात कर दिया है, जिसे कुछ ही घंटों में भारतीय क्षेत्र के पास तैनात किए जा सकता है। उधर, चीनी सैन्य जमावड़े का मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना ने भी वहां अपनी ताकत और तैनाती यकायक बढ़ा दी है। वह भी पूर्वी लद्दाख में तोपों और सैन्य उपकरणों को भेज रही है। 
 दोनों पक्षों की कई दौर में बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला 
भारतीय और चीनी पक्ष पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सभी स्थानों पर बटालियन और ब्रिगेड स्तर पर एक-दूसरे से बात कर रहे हैं, जिसका अभी तक कोई परिणाम नहीं निकाला है। उसका भी नतीजा हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि चीनी जिन स्‍थानों पर थे, किसी भी पोजिशन से पीछे नहीं हटे हैं। विभिन्न स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच लगातार आमना- सामना हो रहा है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में बड़ी संख्या में क्लास ए वाहनों को चीनी सेना के पीछे की पोजिशन पर देखा जा सकता है। इन वाहनों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के भारतीय तरफ से 25-30 किलोमीटर की दूरी पर तैनात किया गया है और कुछ ही घंटों में इसे बॉर्डर पर आगे लाया जा सकता है। 
भारत को बातचीत में उलझाना चाहता है चीन  
ऐसा लगता है कि चीनी पक्ष बातचीत के माध्यम से भारत को उलझाना चाहता है और इसका उपयोग वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कर रहा है। दूसरी ओर कमांडिंग ऑफिसर और ब्रिगेड कमांडर के स्तर पर बातचीत लगभग दैनिक आधार पर हो रही है, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं दिख रहा है। अब दोनों पक्षों के प्रमुख जनरल रैंक के अधिकारी जल्द ही बैठक करेंगे, ताकि क्षेत्र में तनाव को खत्म करने के तरीकों पर चर्चा की जा सके। चीनी पक्ष नियंत्रण रेखा में भारत द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। चीनी सेना के बेस पर क्लॉस ए स्तर के वाहन बड़े पैमाने पर सैटेलाइट इमेज में देखे जा सकते हैं।  
उल्लेखनीय है कि मई की शुरुआत में चीनी सैन्य अधिकारियों ने सीमावर्ती भारतीय क्षेत्रों में उसे अपना बताते हुए गश्त लगानी शुरू कर दी थी। और तभी से पैंगोंग झील और गलवान घाटी में अस्थाई शिविर बना लिए। इस पार भारतीय सेना ने अपना कड़ा विरोध जताते हुए उन्हें तत्काल इस क्षेत्र में शांति बहाल करने की हिदायत दी। जबकि चीनी सेना ने डेमचोक और दौलत बेग (पुराने) पर भी कब्जा करके उस पर अपना दावा ठोंकने की हिमाकत की है।
चीनी सेना ने पैंगोंग त्सू झील और गलवान घाटी में 2500 सैनिक तैनात किए हैं। सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लाख समझाने के बावजूद चीनी सेना वापस अपनी जगह पर लौटी नहीं है। साथ ही वह अपना सैन्य जमावड़ा बढ़ाती जा रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 
भारतीय सेना ने भी वहां अपनी ताकत और तैनाती यकायक बढ़़ा दी है। भारत ने केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के पास नियमित डिवीजन से अतिरिक्त सैनिकों को वहां भेजा है और उन्हें ऊंचाई वाले स्‍थलों पर युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया गया है। सेना की सामान्य तैनाती, जो क्षेत्र में कोरोना महामारी से कुछ हद तक प्रभावित थी, अब लद्दाख में भी होने लगी है, जहां बड़ी संख्या में सैनिकों को विमान और सड़क मार्ग से भेजा गया है।